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चरखे की यादें ! 1702 में अकेले इंग्लैंड ने भारत से लगभग 10 लाख पौंड़ की खादी खऱीदी थी !

आधुनिकता की दौड़ में भूल गए, चरखे की यादें ,शादी में बेटी को चरखा देना थी परंपरा


"देवीलाल बारना" आधुनिकता की दौड़ में कुछ कारगर चीजों को हम पीछे छोडते जा रहे हैं। जोकि पहले तो काफी प्रचलन में रही, लेकिन अब शायद उन्हे हम भूल गए हैं। ऐसे ही चरखा शब्द सुना तो हर किसी ने होगा, लेकिन नई पीढ़ी में काफी लोग चरखे को नही पहचानते। पुराने समय में चरखे पर काफी गीत सुने जा सकते हैं। चरखले आली तेरा चरखा बोलै ओम नाम, तू जपले हरि-हरि हरियाणा का प्रसिद्ध लोकगीत गीत है। आजकल चरखे का चलन काफी कम हो गया है। वैसे तो खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग द्वारा खादी के बढ़ावे के लिए कई योजनाएं चलाई हुई हैं। इसके तहत लोगों को फ्री चरखा व कताई ट्रेनिंग दी जा रही है। लेकिन हरियाणा की यदि बात करें, जहां पहले हर घर में महिलाएं चरखा कताई करती दिखाई देती थी, आज कुछ ही एरिया में कोई-कोई महिला ही चरखा कताई करती दिखाई देती है। बता दें कि भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में यह आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बन गया था। चरखा यंत्र का जन्म और विकास कब तथा कैसे हुआ, इस पर चरखा संघ की ओर से काफी खोजबीन की गई थी। अंग्रेज़ों के भारत आने से पहले भारत भर में चरखे और करघे का प्रचलन था। बताया जाता है कि 1702 में अकेले इंग्लैंड ने भारत से लगभग साढे$़ 10 लाख पौंड़ की खादी खऱीदी थी। हरियाणवी लोकजीवन में तो चरखे की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। सम्भवत: जब से मानव का विकास हुआ, तब से उसने अपने कपड़ों की बुनाई के लिए चरखों से सूत तथा धागे बनाने की प्रक्रिया शुरू की। अमीर खुसरों द्वारा अपने साहित्य में खीर पकाई जतन से चरखा दिया चलाय...., का उल्लेख 13वीं सदी में देखने को मिलता है। पुरानें समय में परिवारों में लड़की की विदाई के साथ दहेज में चरखा देना एक परम्परा का हिस्सा बन गया था। -------- चरखा लकडी से बनाया जाता है। चरखे में एक बैठक, दो खंभे, एक फरई (मोडिय़ा और बैठक को मिलाने वाली लकड़ी) और आठ पंक्तियों का चक्र होता है। देश के भिन्न भिन्न भागों में भिन्न भिन्न आकार के चरखे चलते हैं। चरखे की मजबूती के लिए इसमें ज्यादात्तर लाली वाली शीशम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि शीशम की लाली की लकड़ी में घुण नहीं लगता और वह ज्यादा दिनों तक चलती भी है। चरखे को आधार देने के लिए सबसे पहले टी आकार में दो लकडिय़ां लगाई जाती हैं, जिन्हें पाटड़ी अथवा पाटड़े कहा जाता है। इन्हीं पाटड़ों को स्थापित करने के पश्चात् इनमें दो-दो खूंटें लगाए जाते हैं। एक खूंटे में जहां चरखे का घेरा चलता है, तो दूसरी खूंटियों में तांकू का आधार डलता है। लकड़ी के जिन तख्तों से चरखे का आधार तैयार किया जाता है, उसे पीढ्ढा कहा जाता है। लकड़ी के तख्ते पर खड़े हुए दो खूंटों पर गोलाकार काठ लगाया जाता है, जिसे पींदा एवं मदरा कहते हैं। पींदे के दोनों ओर लकड़ी की फांग्ड़ी, फांखड़ी जोड़ी जाती हैं, जिनका निचला भाग पींदे के सिरों से जुड़ा रहता है। इनमें डलने वाली डोरी जंदणी तथा जनणी कहलाती है। पींदे के किनारों पर चक्राकार में लगाए जाने वाली फांग्डिय़ा पूरे चरखे का चक्र तैयार करती हैं, इन्हीं फांग्डिय़ों के बाहरी ओर लोककलात्मक चित्रकारी देखने को मिलती है। अनेक स्थानों पर इनमें शीशे जड़ दिए जाते हैं, तो कईं स्थानों पर इन फांग्डिय़ों में लकड़ी के अंदर पशु-पक्षी व लोकचित्रात्मक शैली के चित्र निकाले जाते हैं। चरखे का मुख्य आकर्षण ये फांग्डिय़ों ही होती हैं। इसके अतिरिक्त चरखे के आधारात्मक खूंटों पर भी दोनों तरफ लोककलात्मक चित्रकारी देखने को मिलती है। देहात में, चरखा बनाने का काम लकड़ी का कार्य करने वाला कारीगर खाती करता रहा है। पींदे के बीच से बाहर लोहे का गज एवं लकड़ी का हिस्सा (सलाख) निकला हुआ होता है, जिस पर पूरे चरखे का चक्र घूमता है। इसी लकड़ी तथा लोहे के गज पर ही हत्थल़ी लगाई जाती है, हत्थल़ी की एक तरफ छेद होता है और छेद में ही अंगुली डालकर उसे घूमाया जाता है, जिससे सारा चरखा घूमने लगता है। फांखडिय़ों के ऊपर एक महीन रस्सी लपेटी जाती है, जिसे जतनी या जनणी पूरणा कहा जाता है। चरखे के ताक्कू डलने वाले स्थान पर अगली खूंटियों या गूडरियों के अंतर को समान रखने के लिए उनके बीच में एक और लकड़ी ठोकी जाती है, जिसे डंडील कहते है। ताकू और चरखे के पिछले भाग में सम्बन्ध स्थापित करने वाला मोटा धागा माल़ कहलाता है। माल जदंणी के ऊपर से घूमती है, ताकू पर जहाँ माल रहती है। ताकू पर लिपटते हुए सूत का व्यवस्थित रूप देने के लिए ताकू में एक गोलाकार वस्तु लगी रहती है, जिसे दमकड़ा या कांकड़ा कहते है। फोटो परिचय कुरुक्षेत्र। चरखा।


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