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दवाओं से ठीक तो कविताओं से जागरूक कर रहीं डा. मीनाक्षी ढुल

12 वर्ष से सवाएं दे रही हैं आर्युवेदिक चिकित्सक

(देवीलाल बारना) कुरुक्षेत्र। आयुर्वेदिक मैडिकल ऑफिसर डा. मीनाक्षी ढुल एक ओर जहां दवाओं के माध्सम से लोगों को ठीक करने का काम कर रही हैं, वहीं स्वरचित कविताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक करती नजर आती हैं। सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय डा. मीनाक्षी ढुल देश से जुडे हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार नजर आती हैं। डा. मीनाक्षी का कहना है कि उनको बचपन से ही रचनाएं लिखने का शौक है। कॉलेज समय में भी उनकी अनेक रचनाएं कॉलेज की मैग्जीन में छपती थी। अब जब डॉक्टर के पेशे में हैं तो समय कम मिल पाने की वजह से कुछ कम लिख पाती हैं लेकिन समाज से जुडी रहती हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से वे ही उस बहस में शामिल होती हैं जो देश से जुडी हैं। --------- उर्दू में भी लिखती हैं डा. मीनाक्षी ढुल का कहना है कि उन्होने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मैडिकल में बीएससी की। इसके बाद श्री कृष्णा आयुर्वेदिक कॉलेज से बीएएमएस की पढाई पूरी की। इसके बाद उनका चयन आयुर्वेदिक मैडिकल ऑफिसर के रूप में हो गया। पहली पोस्टिंग उनकी कैथल जिले के गांव सेरधा में व उसके बाद लगभग 12 वर्षों से लाडवा के गांव दबखेडा में अपनी सेवाएं दे रही हैं। डा. ढुल ने बताया कि उनको शुरु से कुछ न कुछ नया करने का शौक रहा है इसी के चलते ही उसने एक वर्ष उर्दू का भी लैंग्वेज डिप्लोमा किया। -------- डा. मीनाक्षी ढुल द्वारा मजदूरों के हालात पर लिखी गई कविता ना ये ना ही वोटों के लिए काम करते हैं न इज्जत के लिए न ही शोहरत के लिए काम करते हैं ये तो मेहनत करते हैं और पेट भरते हैं कोई इन्हे मुफ्तखोर तो कोई इन्हे दारूबाज बताता है क्यों नही इसकी थकान का ईलाज बताता है? न कोई फालतू कपडे, न मकान, फिजूल कोई सामान रखते हैं ऊंची बिल्डिंग में बैठकर इनके विरोध में बोलने वालो कोई ऐसे मकान तो बताओ जो बिना मजदूरों के बनते हैं न किसी से शिकायत न बहस मे पडते हैं मीलों की दूरी पैदल चलते हैं सडक बनाने वाले यदि सडकों पर चले तो डंडे पडते हैं न बाबा बनते हैं न मांगकर खाते हैं ये तो बस काम कर स्वाभिमान से खाते हैं तुम्हें कब समझ आयेगा ये मजदूर ही हैं जो देश की नींव का पत्थर गढ़ते हैं।

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